अक्सर ये सोचती हूं मैं...
अलसाई सी रात ठहर क्यों नहीं जाती
उस क्षण
जब
आकाश में तारे टिमटिमाते हैं
और चांद निकलता है अपने पूरे रूप में
बारिश की बूंदें थम क्यों नहीं जाती हैं
उस क्षण
जब
आसमान में छाए होते हैं
काले बादल
और पेड़ों पर चहचहाते पक्षी
दुबके होते हैं अपने घोसलों में
और
मम्मी तल रही होती हैं
गरम पकौड़े
सूरज की किरणें
रुक क्यों नहीं जाती हैं
उस क्षण
जब दिसंबर की ठंड से किटकिटाते हैं दांत
अक्सर ये सोचती हूं मैं
क्यों कर वो एहसास
चिरस्थायी नहीं हो पाता
जो मन को लुभाता है
फिर सोचती हूं
शायद यही प्रकृति का नियम है
तभी तो
रात ठहरती नहीं
सूरज रुकता नहीं
चांद निकलता नहीं अमावश को
और
बारिश की बूदें थमती नहीं...

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