Tuesday, April 21, 2015

                                          मैटरो की सवारी


जब मैटरो शुरु हुई तो मन में बहुत खुशी हुई चलो जी अब बसों में धक्के नहीं खाने पड़ेंगे आराम से बैठकर जायेंगे मैटरो में एसी की ठंडी-ठंडी हवा खाते हुए। एसी की ठंडी हवा मिलने में तो कोई कसर नहीं है। पर बैठने का सपना तो सपना ही रह गया कभी-कभी कभार दया हो जाये, तो बैठ भी जाते हैं। अरे यह तो बात हुई हमारे सुविधा भोगी मन की चाहत की जो कभी भी भरता ही नहीं जितनी सहूलियत दे दो उससे ज्यादा की चाहत करता है। चलिए छोडि़ए इन बातों को सच तो यह है कि मैटरो की सवारी ज्यादा तो नहीं पर थोड़ी आरामदायक तो होती ही है। ना टरैफिक की चिल्ल-पों ना पसीने की चिपचिप। इतना ही नहीं अगर आपको बतरस का शौक है, तो फिर तो यह आपके लिए एकदम परफेक्ट जगह है। हर ओर गुट बना रहता है, जिसमें एक से एक मजेदार बातें होती हैं, जिसे ना चाहते हुए भी सुनने को मन कर जाता है। मैं तो जब घर से आॅफिस के लिए निकलती हूं तो थोड़ी सी थकान सी लगती है लगता है कि क्या लाइफ है यार एकदम मशीन हो गई है, लेकिन जैसे ही मैटरो स्टेशन पर पहुंचती हूं थकान छू मंतर हो जाती है हर दिन कोई न कोई ऐसा जरूर मिल जाता है कि पूरा रास्ता कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। मैटरो में हर दिन होने वाली घटनाएं इतनी मजेदार होती हैं कि उस पर पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। अब पूरा गं्रथ लिखने की तो मेर सामथ्र्य नहीं है, पर हां हर दिन की कुछ मजेदार चीजें तो मैं शेयर कर ही सकती हूं, तो फिर देर किस बात की आज से ही खाते हैं मैटरो की सवारी में मिलने वाली अटपटी-चटपटी खबरों की चाट देखते हैं यह सिलसिला कब तक चल पाता है, पर कोशिश तो जरूरत यही रहेगी कि जब तक कर पाउं आप सबको मजेदार तरीके से अपने अनुभवों की झलक दिखा सकूं।



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