झूठा घमंड ना कीजो कोय
बहुत देर से सुजाता अपनी बहू अनुराधा की राह देख रही थीं, उसे घर से गए काफी देर हो गई थी। सुजाता को इस बात की ंिचंता नहीं थी कि अनुराधा ठीक-ठाक होगी कि नहीं उन्हें तो इस बात की ंिचंता थी की सारा घर अस्त-व्यस्त पड़ा हुआ था। जब दोपहर तक अनुराधा वापस नहीं आई, तो सुजाता उसे कोसते हुए घर का काम निपटाने लगीं। सब्जी काटते हुए वे तेजी से बड़बड़ा भी रही थीं। दोपहर का समय हो गया लेकिन महारानी जी का कुछ पता नहीं। घर आएं तो अच्छी तरह से खबर लेती हूं। जरा-सी देर को बाहर जाने की इजाजत क्या दे दी मैडम घर का रास्ता ही भूल गईं।
दोपहर का खाना बनाने के बाद वो गुस्से से आंगन से दरवाजे के चक्कर काट रही थीं कि तभी घंटी बजी। दरवाजा खोला, तो अनुराधा को सामने खड़ा देखकर वे अपना आपा खो बैठीं और उसे अंदर आने का मौका दिये बिना ही उस पर झपट पड़ीं। ये टाइम है घर आने का? जब देखो तब बाहर घूमने का बहाना चाहिए घर के काम काज से कोई सरोकार नहीं। आने दो मन्नत को तब तुम्हारे पर कतरवाती हूं।
सासू मां का रौद्र रूप देखकर अनुराधा घबरा गई थी वो धीरे से बोली, मां जी मुझे अंदर तो आने दीजिए फिर बताती हूं कि मुझे देर क्यों हो गई?
उसकी बात बीच में काटते हुए सुजाता चीखने लगीं, रहने दो बहाना बनाने की जरूरत नहीं। क्या मैं जानती नहीं हूं तुम्हें ना जाने किससे मिलने जाती हो मौका मिलते ही।
बड़ी देर से अनुराधा अपनी सास की बात चुपचाप सुन रही थी, पर जब वो उसके मां-बाप को कोसने के साथ-साथ उसके चरित्र पर लांछन लगाने लगीं, तो उसे बरदाश्त नहीं हुआ और वो गुस्से से फट पड़ी। आप समझती क्या हैं अपेन आपको? जब देखो तब टोकाटाकी तंग आ गई हूं मैं इस रोज-रोज की किचकिच से। आज तो आपने हद ही कर दी। कहे देती हूं मैं आपसे इस तरह की ओछी बातें मुझे पसंद नहीं। आइंदा मुझसे इस तरह की बात मत कीजियेगा। कहते हुए अनुराधा रोते हुए अपने कमरे में चली गयी।
सुजाता अवाक सी एकटक सुजाता को जाते हुए देखती रह गईं उसका यह रूप उनके लिए एकदम नया था। वो सोचने लगीं क्या यह वही अनुराधा है, जिसे वो गाय समझकर अपने बेटे मन्नत के लिए यह सोचकर ब्याह लायी थीं कि मामा-मामी के रहमोकरम पर पली बिन मां-बाप की बच्ची उनकेे कहे में रहेगी।
अनुराधा पर उन्होंने खूब अंकुश लगाकर रखा। सुजाता ने ना कभी उसे मन का खाने दिया ना पहनने। इतना ही नहीं मन्नत को भी उन्होंने उसके ज्यादा करीब नहीं होने दिया। उन्हें हमेशा इस बात का डर लगा रहता था कि अगर उन्होंने अनुराधा को ज्यादा ढील दी, तो वह उनके बेटे पर अपना कब्जा कर लेगी और वो मात्र घर की नौकरानी बनकर रह जायेंगी।
मन्नत के बारे में सोचते हुए एक क्षण को उनके चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई फिर दूसरे ही क्षण उनकी आंखें डबडबा गई। तीन बेटियों के बाद जनमा मन्नत उनकी आंखों का तारा था। जब उन्होंने उसे जनम दिया तो उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। पति की रोबदाब वाली नौकरी और चांद सा बेटा। यही तो चाहती थीं वह हमेशा से। पति की कमाई का घमंड तो उन्हें शुरू से ही था अब बेटा पैदा हो जाने के बाद उनका दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच गया। तीन बेटियों के जनम ने उनके चेहरे की चमक को थोड़ा कम कर दिया था। लेकिन मन्नत की आमद ने उनके अहं को बढ़ा दिया। अब वे अपनी सास को भी बात-बात पर लताड़ने लगीं।
सुजाता के तेज व्यवहार से सभी दुखी थे, लेकिन घर की शांति बनाए रखने के लिए कोई कुछ नहीं बोलता था।
सास तो कभी उनके आगे जुबान नहीं खोलती थीं वो हमेशा यही सोचतीं बेटा खुश है, तो फिर मैं क्यों घर में बेकार का कलेश करुं। उनकी इस सोच को सुजाता उनकी कमजोरी समझकर किसी के भी सामने उनका अपमान करने से नहीं चूकतीं।
मन्नत के जनम के बाद पड़ोस की राधा काकी बोल ही पड़ीं, अरी सुजाता इतना ना इतरा, तेरी सास ने भी बेटा जना था। देख ले बुढ़ापे में कितना सुख भोग रही हैं तुझे भी वही मिलेगा, जो तेरी सास को मिल रहा है। फिर तेरा बेटा, तो तेतर है। कहते हैं तेतर बेटी राज रजावे और तेतर बेटा भीख मंगावे... अभी भी समय है चेत जा बहुरिया अपनी सास का दि लना दुखा।
राध काकी की बात सुजाता को बड़ी कड़वी लगी, गुस्से में आकर वो राधा काकी का अपमान करने से ना चूकीं। इस घटना के बाद से मुहल्ले के लोग सुजाता से कट गए। नाते-रिश्तेदार तो पहले ही मुंह मोड़ चुके थे।
कहते हैं ना घमंड किसी का नहीं टिकता। मां मुंहसे भले की कुछ ना कहे पर दिल दुखता है, तो बद्दुआ निकल ही जाती है। अभी मन्नत पांच बरस का भी नहीं हुआ था कि सुजाता के पति अजीत ने आंखें मूंद लीं। उन्हें अपनी मां की मौत का सदमा बरदाश्त नहीं हुआ। सुजाता के कलेश के मारे वो चाहकर भी अपनी मां उचित इलाज नहीं करा पाएं यही बात उन्हें सालती रही और मां के मरने के महीेन भर बाद ही वो भी चल बसे।
पति के जाने के बाद सुजाता कुछ दिनों तक तो सुन्न सी पड़ी रही कुछ बोलती नहीं थी बस एकटक जहां देखतीं तो देखती ही रह जातीं। पड़ोसियों ने उन्हें हिम्मत दिलाई। अपनी बेटियों और नन्हे मन्नत का मुंह देखकर उन्होंने खुद को संभाला।
दिन चाहे सुख के हों या दुख के बीत ही जाते हैं इसी तरह से सुजाका के दिन भी बीतने लगे। धीरे-धीरे समय गुजरता गया बेटियां ब्याहकर अपने घर चल गईं और मन्नत का भी ब्याह हे गया। मन्नत की उंची नौकरी ने सुजाता को फिर से मगरूर बना दिया। ब्याह के बाद उन्होंने एक दिन भी सुजाता को सुख से नहीं रहने दिया। बात-बात पर मन्नत से उसकी शिकायत करतीं। जब मन्नत उसे डांटता तो उन्हें बड़ी खुशी होती।
आज भी मन्नत जैसे ही धर में घुसा, वो उसके सामने अनुराधा की शिकायत की पोटली खोलकर बैठ गयीं। मन्नत चुपचाप उनकी बात सुनता रहा। फिर बोला, मां अनुराधा बहुत बुरी है ना?
सुजाता बोल पड़ीं, हां बेटा पता नहीं मेरे ही अक्ल पर पत्थर पड़ा था, जो मैं उसे अपनी बहू बनाकर ले आयी।
मां बी बात सुनकर मन्नत सधे हुए लहजे में बोला, ठीक है मां फिर वो हमेशा-हमेशा के लिए इस घर से चली जाएगी।
सुजाता हैरानी से बोलीं, क्या तू सच कह रहा है बेटा?
हां, मां मैं सच कह रहा हूं यह आपका घर है। यहां आपकी ही मर्जी चलेगी कहते हुए मन्नत अपने कमरे में चला गया।
सुजाता खुशी से बौरा-सी गयीं। वो सोचने लगीं अभी भी मेरा बेटा मेरी बात मानता है उसके लिए मुझसे बढ़कर कुछ नहीं।
सुजाता की खुशियों में खलल डालते हुए मन्नत बोला, मां हम जा रहे हैं।
मन्नत की बात सुनकर सुजाता हैरानी से उसका चेहरा देखने लगीं और अचकचाकर बोलीं, कहां?
मन्नत धीरे से बोला, आपसे और आपके घर से बहुत दूर जहां अनुराधा और मैं प्यार से रह सकें। शायद आपको सुनकर अच्छा ना लगे, मां मैं अनुराधा से बेहद प्यार करता हूं। भले ही आपने कभी हम दोनों को करीब नहीं होने दिया, लेकिन सच यही है कि अनुराधा की अच्छाईयों ने कब मुझे उसके इतना करीब ला दिया मुझे समण् ही नहीं आया। मां ना तो आप एक अच्छी बन पायीं और ना ही अच्छी सास। काश आप रिश्तों की गहराई को समझ पातीं। मां बनकर भी आप प्यार की कोमल भावनाओं से अछूती ही रह गईं।
कुछ देर सुजाता भौचक्की-सी मन्नत को देखती रहीं फिर हकलाते हुए बोलीं, तू क्या कह रहा है मैं कुछ समझी नहीं? तू अनुराधा के लिए अपनी मां को छोड़कर जा रहा है?
मैं जो भी कह रहा हूं आप अच्छी तरह से समझ रही हैं मां अभी भी आपको मेरी चिंता नहीं है बस फिक्र है, तो इस बात की कि हमारे चले जाने से आपकी गरदन नीची होगी। मां हरदम घर में आपने अपनी हुकूमत चलाई है, पर अब और नहीं। मैं आपकी मनमानी नहींसह सकता। मैंने दादी को इस घर में घुट-घुट कर जीते देखा है, लेकिन मैं अपनी बीवी के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा कहते हुए मन्नत अनुराधा का हाथ पकड़कर घर की दहलीज लांघ गया।
सुजाता भरी-भरी आंखों से मन्नत को जाते हुए देखती रहीं। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका लाडला बेटा उन्हें छोड़कर चला जाएगा। कई दिन तक सुजाता मन्नत की राह देखती रहीं पर वह वापस नहीं आया। अब रह-रहकर सुजाता को मन्नत के जनम के समय कही गयी राधा काकी की बात, तेतर बेटा... याद आने लगी। उनका गुरूर टूट गय था। अकेला घर काटने को दौड़ रहा था। कभी उनकी आंखों के सामने अपनी सास का दयनीय चेहरा आ जाता तो कभी अनुराधा का उदास चेहरा। सुजाता अपने आप से पूछने लगीं क्या सच ही तेतर बेटा दुख ही देता है। गलती क्या मन्नत के तेतर होने की हैया फिर मेरे गलत व्यवहार की। अपने सवाल का जवाब उन्हें खुद ही मिल गया। अपने किये का विचार करते हुए उनकी आंख लग गई। अगली सुबह जब वह उठीं, तो खुद को काफी हल्का महसूस किया। नहाने के बाद पहली बार सास की तसवीर के आगे हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं और बुदबुदाने लगीं मां जी मुझे माफ कर दीजिए। अपनी सास की तस्वीर के आगे दिया जलाने के बाद उन्होंने अपनी सास के नाम पर भूखों को खाना खिलाया और फिर सुजाता अपने रूठे बेटे मन्नत और अपनी बहू अनुराधा को घर लौटाने के लिए चल पड़ीं।